‘बहारों फूल बरसाओ…’ कहकर बापू ने निंदक का महत्व समझाया, रामनाम को बताया हृदय की औषधि
आगरा। “श्री गुरु चरण सरोज रज…” की रामधुन और “जय श्रीराम” के उद्घोष के बीच मोरारी बापू ने बुधवार को करूणानिधान परिवार द्वारा फतेहाबाद रोड स्थित जेपी वेडिंग ग्राउंड में आयोजित श्री रामकथा के द्वितीय दिवस का शुभारंभ किया। ऋषि पंचमी की छांव में ‘मानस ऋषि पंचमी’ की कथा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने ऋषि-मुनियों की वंदना की और श्रद्धालुओं को भावनात्मक रूप से यमुना में स्नान करने का भाव कराया। रामनाम की धुन से पूरा कथा पंडाल गुंजायमान हो उठा। जल, थल और नभ में रामकथा का अमृत बरसा चुके बापू आगरा की धरती को भी रामभक्ति के रस से सराबोर कर रहे हैं।
बापू ने विगत दिवस के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए बताया कि श्रीरामचरितमानस में तुलसीदास जी ने सात सौ से अधिक बार ‘मुनि’ शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने ऋषि और मुनि के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि ऋषि-मुनियों की परंपरा विविध स्वरूपों और साधना-पथों से समृद्ध रही है। वाल्मीकि, भारद्वाज, अगस्त्य, अत्रि, विश्वामित्र और वशिष्ठ जैसे ऋषियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने उनके प्राकट्य और जीवन-परंपराओं का वर्णन किया। ऋषियों की प्रतिष्ठा, मुनियों की निष्ठा
बापू ने कहा कि ऋषियों को राजप्रतिष्ठा, लोकप्रतिष्ठा और कर्मप्रतिष्ठा प्राप्त हो सकती है, जबकि मुनियों की साधना का केंद्र उनकी निष्ठा है—ईश्वर में, इष्ट के नाम में, मंत्र में, आत्मा में, गुरु में और ग्रंथ में। मुनि प्रायः विरक्त होकर कुटिया में निवास करते हैं। उन्होंने कहा कि जिस साधक में प्रतिष्ठा और निष्ठा का संतुलन हो, वही परम साधु कहलाने योग्य है। गुजरात के प्रसिद्ध भक्त नरसी मेहता का प्रसंग सुनाते हुए बापू ने कहा कि उनके भीतर आत्मनिष्ठा प्रबल थी। मुनि-भाव प्राप्त करने के लिए आत्मनिष्ठ होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि “खूब भी साधु है, शबरी भी साधु है और मन भी साधु है”—अर्थात साधुता किसी बाहरी पहचान तक सीमित नहीं, बल्कि भाव और आचरण में प्रकट होती है।

